शंकराचार्य: हिंदू धर्म के सर्वोच्च गुरु और उनकी महत्वता

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शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) हिंदू धर्म के एक महान धर्मगुरु, दार्शनिक, और तात्त्विक आचार्य थे, जिन्होंने भारत में आद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के सिद्धांत को प्रचारित किया। उन्हें जगद्गुरु (सार्वभौम गुरु) के रूप में सम्मानित किया जाता है। शंकराचार्य का योगदान न केवल भारतीय धार्मिक दर्शन में, बल्कि हिंदू समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक संरचना में भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

शंकराचार्य कौन होते हैं?

शंकराचार्य वह संत होते हैं जो शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध चार प्रमुख मठों (पीठ) के प्रमुख होते हैं। इन मठों का उद्देश्य सनातन धर्म की रक्षा करना और उसका प्रचार-प्रसार करना है। शंकराचार्य का चुनाव विशेष धार्मिक योग्यताओं और संस्कृत, वेदांत और पुराणों के गहरे ज्ञान पर आधारित होता है।

आदि शंकराचार्य ने अपने प्रमुख चार शिष्यों को भारत के विभिन्न हिस्सों में चार मठों की स्थापना करने के लिए नियुक्त किया था, ताकि वे भारतीय समाज में धर्म और तात्त्विक शिक्षा का प्रचार कर सकें। इन मठों के प्रमुख को ही शंकराचार्य कहा जाता है।

शंकराचार्य के शिष्य

शंकराचार्य का इतिहास और योगदान

आदि शंकराचार्य का जन्म लगभग 700 से 750 ईस्वी के बीच हुआ था, और उनका जन्म स्थान केरल राज्य का कालडी गांव बताया जाता है। शंकराचार्य ने भारत में आद्वैत वेदांत (Non-Dualism) के सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जिसमें उन्होंने बताया कि भगवान ब्रह्म ही सर्वथा हैं और संसार की भिन्नताएँ केवल माया हैं।

शंकराचार्य के चार मठ

आदि शंकराचार्य ने चार प्रमुख मठों की स्थापना की थी, जो आज भी सनातन धर्म के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं:

  1. गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा)
  2. ज्योतिष मठ (बद्रीनाथ, उत्तराखंड)
  3. शृंगेरी मठ (कर्नाटक)
  4. शारदा मठ (द्वारका, गुजरात)

इन मठों के प्रमुखों को शंकराचार्य के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक मठ का अपना धर्मिक कार्यक्षेत्र और वेदों का ज्ञान है।

आदि शंकराचार्य और उनके प्रमुख शिष्य - सनातन धर्म के प्रचारक

शंकराचार्य के चयन की प्रक्रिया

शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति को निम्नलिखित शर्तों का पालन करना आवश्यक होता है:

  • संन्यासियों की तरह जीवन जीना।
  • चतुर्वेद, संस्कृत और वेदांत का गहन ज्ञान होना।
  • उनके चयन के लिए अखाड़ों के प्रमुखों और प्रतिष्ठित संतों की सहमति आवश्यक होती है।
  • शंकराचार्य को ब्राह्मण होना चाहिए, जो वेदों, पुराणों और तात्त्विक शास्त्रों में निपुण हो।

शंकराचार्य का महत्व

हिंदू धर्म में शंकराचार्य का दर्जा अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल धार्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि एक महान दार्शनिक और समाज सुधारक के रूप में भी माना जाता है। उन्होंने देशभर में मठों की स्थापना की ताकि सनातन धर्म का प्रसार हो सके। उनके द्वारा प्रतिपादित आद्वैत वेदांत ने भारतीय धार्मिक जीवन को एक नई दिशा दी और यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।

शंकराचार्य के कार्यों का प्रभाव न केवल उनके जीवनकाल में था, बल्कि उनके द्वारा स्थापित मठ और उनके शिष्य आज भी हिंदू समाज में शिक्षा, साधना और धार्मिक कार्यों के केंद्र बने हुए हैं।

शंकराचार्य के प्रमुख मठ

  1. गोवर्धन मठ (पुरी):
    गोवर्धन मठ का प्रमुख संन्यासी निश्चलानंद सरस्वती हैं। इस मठ का संबंध ऋग्वेद से है और यह मठ आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद आचार्य द्वारा स्थापित किया गया था।
  2. ज्योतिष मठ (बद्रीनाथ):
    इस मठ के प्रमुख संन्यासी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं। ज्योतिष मठ का संबंध अथर्ववेद से है और इसकी स्थापना आदि शंकराचार्य के शिष्य त्रोटकाचार्य ने की थी।
  3. शारदा मठ (द्वारका):
    सदानंद सरस्वती इस मठ के शंकराचार्य हैं। शारदा मठ का संबंध सामवेद से है और इसके पहले मठाधीश हस्तामलक थे।
  4. शृंगेरी मठ (कर्नाटक):
    शृंगेरी मठ के प्रमुख शंकराचार्य जगद्गुरु भारती तीर्थ हैं। इस मठ का संबंध यजुर्वेद से है और इसके पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वराचार्य थे।

निष्कर्ष

शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे भारतीय दर्शन और संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित आद्वैत वेदांत ने जीवन को समझने और ब्रह्म से एकत्व की ओर मार्गदर्शन किया। उनका योगदान आज भी भारतीय समाज में जीवित है और शंकराचार्य की उपाधि आज भी उन महापुरुषों को दी जाती है जो भारतीय धार्मिक जीवन को उच्चतम स्तर पर ले जाते हैं।


FAQ: शंकराचार्य कौन होते हैं?

1. शंकराचार्य कौन होते हैं?

शंकराचार्य एक महान हिंदू धर्मगुरु और दार्शनिक होते हैं, जिन्होंने भारत में अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने चार मठों की स्थापना की और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अपने चार प्रमुख शिष्यों को देश के चार दिशाओं में भेजा।

2. शंकराचार्य का चयन कैसे होता है?

शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति का ब्राह्मण परिवार से होना जरूरी है, उसे वेद, संस्कृत, पुराणों और वेदांत का गहरा ज्ञान होना चाहिए। इसके अलावा, उसे संन्यास लेने के बाद आचार्य महामंडलेश्वर और प्रतिष्ठित संतों की सहमति की आवश्यकता होती है। इस चयन प्रक्रिया में काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति भी आवश्यक होती है।

3. शंकराचार्य और आदि शंकराचार्य में क्या अंतर है?

आदि शंकराचार्य वह पवित्र व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को प्रतिपादित किया और देशभर में मठों की स्थापना की। “शंकराचार्य” उपाधि उस गुरु को दी जाती है जो इन मठों का नेतृत्व करता है और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहता है।

4. शंकराचार्य की प्रमुख शिक्षाएँ क्या थीं?

आदि शंकराचार्य की प्रमुख शिक्षा थी कि ब्रह्म ही सत्य है और संसार मिथ्या है। उन्होंने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को ब्रह्म के साथ एकत्व में मान्यता दी और भक्ति, ज्ञान, और कर्म के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति को बताया।

5. शंकराचार्य के चार प्रमुख मठ कौन से हैं?

आदि शंकराचार्य ने चार प्रमुख मठों की स्थापना की थी:

  • द्वारका मठ (पश्चिम)
  • पुरी गोवर्धन मठ (पूर्व)
  • शृंगेरी मठ (दक्षिण)
  • ज्योतिर मठ (उत्तर)

6. शंकराचार्य उपाधि का महत्व क्या है?

शंकराचार्य उपाधि को हिंदू धर्म में सर्वोच्च धार्मिक और आध्यात्मिक पद माना जाता है। यह पद उन गुरुओं को दिया जाता है जो मठों का नेतृत्व करते हैं और सनातन धर्म के सिद्धांतों को फैलाने का कार्य करते हैं।

7. शंकराचार्य के मठों में शिक्षा दी जाती है?

हां, शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों में सनातन धर्म, वेद, वेदांत, संस्कृत, और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कराया जाता है। इसके अलावा, इन मठों में समाज सेवा और धार्मिक अनुशासन पर भी ध्यान दिया जाता है।

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